Tuesday, November 2, 2010

राम-खटारी


एक दिन वो था , जब तुझे घर ले के आया था ,
माँ ने माथे पे तेरे तिलक लगाया था ,
मुझे रास्तो ने और तुझे गड्ढो ने सताया था ,
दिल पे मेरे , engine पे तेरे शनि का साया था,
किसी ऑटो-dealer ने पत्रिका देख मिलाया था ,
वो साथ जो बड़ी महंगी कीमत पे आया था |

न मेरे रास्ते बदले , न उनके गड्ढे ,
मगर हम साथ थे जब तक हर दिन लगता था बर्थडे ,
मजबूर यारो की सवारी थी तू ,
ये बात अलग है की खटारी थी तू ,
बजता था सब कुछ होर्न छोड़कर ,
इंडिकेटर दगा दे जाता था हर मोड़ पर |

एक साल बिना brake चलाया तुझको ,
तुने मुझे और मैंने बचाया तुझको ,
मै तंगहाल था तुझे सजा न सका ,
कुछ पुर्जे भी टूटे तो फिर लगा न सका
अब जा रहा हूँ कर के तुझको हवाले ,
एक शख्स के जो तुझे खूब सम्हाले ,
ये विरह नहीं नयी शुरुआत है ,
तुमको नया जीवन मेरी सौगात है ||

Sunday, October 31, 2010

मै इंतज़ार करूँगा तुम्हारे आने का

मेरे खतो के कफ़न काग़ज़ी लिफाफो से ,
दफ़न से हर्फ़ ज़रा अब महक रहे होगे,
अब उनकी खूबसूरती उतर गयी होगी ,
वक़्त के साथ मायने बदल गए होगे |

मगर हैरत मेरे पते पे लौटते क्यूँ नही ,
तुम्हे छूते ही चिपक जाते हैं सायो की तरह,
तुम्हे शिकन नही होती सडन से क्यूँ उनकी ,
कही जुकाम तो नही , नही आने की वजह |

खतो को फातेहा पढता हूँ आज मै अपने ,
उन्हें सुपुर्द किये जा रहा हूँ वो सपने ,
महक जिनकी सड़ांध कम कर दे ,
और शायद जुकाम भी हर दे |

मुझे तो शौक था पत्थर से दिल लगाने का ,
और हुनर देखना दाँतो से नख चबाने का,
ज़रा जल्दी करो होता है वक़्त जाने का ,
हश्र भी देखना है तेरे उस बहाने का |

मै इंतज़ार करूँगा तुम्हारे आने का ||