Saturday, January 15, 2011

पतंग



ग़म के गुबार काट कर उडी पतंग ,
डोर के साथ साथ झूम रही मस्त मलंग ,
पींगे मार रही झूलो सी ,
रंग बिखरा रही है फूलो सी ,
आज तू देख मेरे ढंग कहे मेरी पतंग ,
डोर के साथ साथ झूम रही मस्त मलंग ||

ढील दो हसरतो को चाँद की सितारो की ,
इसे गरज नहीं कश्ती की पतवारो की ,
तेज आंधी के थपेड़े भी झेल जायेगी ,
कट गयी तो किसी बच्चे का दिल लुभाएगी ,
पेचो - ख़म ज़िन्दगी के क्या फसायेंगे इसको ,
काट कर उड़ गयी ऐसो को ये अक्खड़ निहंग ,
डोर के साथ साथ झूम रही मस्त मलंग ||

Tuesday, January 11, 2011

सात ख्वाहिशें

आज भी चेहरे बदल कर मुझसे मिलती है ख़ुशी ,
गर मुनासिब हो तो उसको देखना चाहूँगा मै
यूँ सुलगती जा रही है ज़िन्दगी क्यूँ खुद-ब-खुद ,
आखिरी कश ले के सिगरेट छोड़ना चाहूँगा मै

कोई पत्थर तो उठा मारो कि जिंदा हूँ अभी ,
हो कर आवारा गली में भौंकना चाहूँगा मै
मिल सके न मंजिलें तो ये भी कर के देख लूँ ,
राह अपनी घर को फिर से मोड़ना चाहूँगा मै

कोई आईना तो होगा जो मुझे पहचान ले ,
मेरे मक्तो में तखल्लुस जोड़ना चाहूँगा मै
नाम आ जाए तुम्हारा तो खता ये माफ़ हो ,
हर्फ़-ऐ-उल्फत लिख कलम ये तोडना चाहूँगा मै

नींद आ जाये मुझे कोशिश तो ये ही है सनम ,
ख़्वाब के तारों की चादर ओढना चाहूँगा मै
यूँ सुलगती जा रही है ज़िन्दगी क्यूँ खुद-ब-खुद ,
आखिरी कश ले के सिगरेट छोड़ना चाहूँगा मै